पौड़ी में तेंदुए के हमले में पांच साल की बच्ची की मौत के बाद हंगामा, डीएफओ से अभद्रता का आरोप

बच्ची की मौत के बाद सुरक्षा इंतजाम करने पहुंची वन विभाग की टीम का ग्रामीणों ने विरोध किया; डीएफओ ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

पौड़ी गढ़वाल में तेंदुए के हमले में पांच साल की बच्ची की मौत के बाद क्षेत्र में तनाव की स्थिति बन गई। घटना के बाद वन विभाग की टीम प्रभावित इलाके में पिंजरे लगाने और लोगों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने पहुंची थी। इसी दौरान ग्रामीणों के एक समूह ने वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों का विरोध किया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पौड़ी के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) महातिम यादव के साथ धक्का-मुक्की की गई और उन्हें जमीन पर गिरा दिया गया। उप प्रभागीय वनाधिकारी आयशा बिष्ट को भी कथित तौर पर करीब 50 मिनट तक एक कमरे में बंद रखा गया। वन विभाग की टीम का कहना था कि वह तेंदुए की गतिविधियों पर नियंत्रण और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए मौके पर पहुंची थी।

घटना के बाद डीएफओ महातिम यादव ने पौड़ी कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई। उत्तराखंड भारतीय वन सेवा संघ ने भी वन अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार की निंदा की है। संघ ने कहा कि वन्यजीव हमलों के बाद राहत और सुरक्षा उपाय लागू करने पहुंचे कर्मचारियों के साथ हिंसा या धमकी स्वीकार नहीं की जा सकती। वहीं ग्रामीणों की चिंता भी गंभीर है, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में तेंदुए और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही के कारण बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर भय बना रहता है। ऐसे मामलों में वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय बेहद जरूरी है।

उत्तराखंड के कई पर्वतीय इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी समस्या बना हुआ है। जंगलों से सटे गांवों में तेंदुए की मौजूदगी की सूचना मिलने पर ग्रामीण अक्सर बच्चों को अकेले बाहर भेजने से बचते हैं। वन विभाग की ओर से पिंजरे लगाने, गश्त बढ़ाने और लोगों को सतर्क रहने की सलाह जैसे कदम उठाए जाते हैं, लेकिन स्थानीय लोग कई बार इन उपायों को पर्याप्त नहीं मानते। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि प्रभावित गांवों में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कैसे मजबूत की जाए। ग्रामीणों की सुरक्षा के साथ वन कर्मचारियों की सुरक्षा भी जरूरी है, ताकि वे बिना दबाव के अपना काम कर सकें। पुलिस शिकायत के आधार पर मामले की जांच कर रही है।