देहरादून में छह साल की बच्ची से यौन अपराध का गंभीर मामला, आरोपी किशोर बाल सुधार गृह भेजा गया

पटेलनगर क्षेत्र में दर्ज मामले के बाद पुलिस ने कार्रवाई की, पीड़िता के मेडिकल में देरी पर दो सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों से मांगा गया जवाब।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र में छह वर्षीय बच्ची से जुड़े यौन अपराध का गंभीर मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में 12 वर्षीय किशोर के खिलाफ केस दर्ज कर उसे संरक्षण में लेकर बाल सुधार गृह भेज दिया है। घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने पीड़िता और आरोपी से पूछताछ की तथा आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू की। पुलिस के अनुसार घटना की सूचना सोमवार देर शाम मिली थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपी किशोर ने बच्ची को आपत्तिजनक वीडियो दिखाकर उसके साथ यौन अपराध किया। मामला सामने आने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों ने जांच शुरू की और पीड़िता का चिकित्सकीय परीक्षण कराने की प्रक्रिया शुरू की गई। इस घटना ने बच्चों की सुरक्षा, डिजिटल सामग्री तक उनकी पहुंच और समाज में बाल संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पीड़िता की पहचान और निजता पूरी तरह सुरक्षित रखी जाए तथा उसे आवश्यक चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।

मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराने के लिए उसके परिजनों और पुलिस को दो सरकारी अस्पतालों के बीच कई घंटे तक चक्कर लगाने पड़े। रिपोर्ट के अनुसार बच्ची को पहले कोरोनेशन अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे दून अस्पताल भेज दिया गया। लेकिन वहां भी आवश्यक जांच की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी और उसे दोबारा कोरोनेशन अस्पताल लाना पड़ा। रात करीब 11 बजे शुरू हुई इस प्रक्रिया के बाद सुबह लगभग पांच बजे तक परिजन और पुलिसकर्मी अस्पतालों के बीच परेशान रहे। इस दौरान बच्ची और उसके परिवार को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा। मामला स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद नाराजगी जताई गई और संबंधित अस्पतालों से जवाब मांगा गया। स्वास्थ्य सचिव विनय शंकर पांडेय ने मामले का संज्ञान लेते हुए अधिकारियों को तलब किया। इसके बाद दोनों अस्पतालों की कार्यप्रणाली की जांच के निर्देश दिए गए। निदेशक डॉ. आशुतोष सयाना को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। संबंधित अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी गई है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मेडिकल प्रक्रिया में देरी किन कारणों से हुई।

इस घटना ने सरकारी अस्पतालों में बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों के निस्तारण की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। यौन अपराध से पीड़ित बच्चों को चिकित्सा सहायता देते समय संवेदनशीलता, गोपनीयता और समयबद्ध प्रक्रिया का पालन अत्यंत जरूरी होता है। ऐसे मामलों में अस्पतालों के बीच समन्वय की कमी से पीड़ित परिवार को अतिरिक्त परेशानी नहीं होनी चाहिए। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि जांच में लापरवाही पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने। बच्चों के संरक्षण से जुड़े कानूनों के तहत पीड़ित को सुरक्षित वातावरण, चिकित्सा सुविधा, परामर्श और कानूनी सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। स्कूलों, अभिभावकों और समाज को भी बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों तथा उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अनुचित सामग्री तक बच्चों की पहुंच रोकने के लिए परिवार और संस्थानों को जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी। पुलिस मामले की जांच कर रही है और आरोपी नाबालिग होने के कारण उसके संबंध में किशोर न्याय कानून के प्रावधान लागू होंगे। पीड़िता की पहचान उजागर किए बिना मामले की संवेदनशीलता और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।